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होर्मुज के बाद दूसरे झटके की तैयारी में ईरान; एक और समु्द्री रास्ता बंद करने की दी धमकी, अटक गई दुनिया की सांसें

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International Desk:पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने एक और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को लेकर चेतावनी दी है। ईरान ने संकेत दिया है कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है तो वह बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को भी निशाना बना सकता है। यह मार्ग वैश्विक तेल और व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यवधान से तेल की कीमतें, शिपिंग लागत और दुनिया भर में महंगाई बढ़ सकती है, जिसमें भारत भी प्रभावित होगा।पहले से ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार दबाव में हैं, ऐसे में बाब-अल-मंदेब पर संभावित खतरे ने दुनिया की चिंता और बढ़ा दी है।

 

क्या है बाब-अल-मंदेब ?
बाब-अल-मंदेब, जिसका अरबी में अर्थ “आंसुओं का दरवाजा” है, यमन और अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र (जिबूती और इरिट्रिया) के बीच स्थित है। यह जलमार्ग:

लाल सागर (Red Sea) को अदन की खाड़ी (Gulf of Aden) से जोड़ता है।
स्वेज नहर (Suez Canal) तक पहुंच का प्रमुख रास्ता है।
एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच व्यापार की जीवनरेखा माना जाता है।
दुनिया के लगभग 15 प्रतिशत समुद्री व्यापार का आवागमन इसी मार्ग से होता है।

 

ईरान की चेतावनी क्यों अहम?

ईरान समर्थित हूती विद्रोही पहले भी लाल सागर और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में जहाजों पर हमले कर चुके हैं। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो:

तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होगी।
जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा चक्कर लगाना पड़ेगा।
शिपिंग लागत और बीमा खर्च बढ़ जाएगा।
वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ेगा।
तेल और गैस की कीमतों में उछाल आ सकता है।

भारत पर क्या पड़ेगा असर ?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है। अगर बाब-अल-मंदेब और हॉर्मुज दोनों मार्ग प्रभावित होते हैं तो:

कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है।
आयात लागत बढ़ने से महंगाई पर दबाव आ सकता है।
भारत-यूरोप समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है।

बढ़ सकता है वैश्विक संकट
यमन के हूती विद्रोही, जिन्हें ईरान का करीबी सहयोगी माना जाता है, पहले भी लाल सागर में कई व्यावसायिक जहाजों को निशाना बना चुके हैं। हूती नेताओं ने पहले संकेत दिए थे कि जरूरत पड़ने पर बाब-अल-मंदेब को बंद करना भी एक विकल्प हो सकता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां और ऊर्जा बाजार स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इजराइल, ईरान और उनके सहयोगी समूहों के बीच टकराव और बढ़ता है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। ऊर्जा, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ने वाला प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झटका दे सकता है।