नेशनल डेस्क। दिल्ली हाई कोर्ट ने बहुचर्चित ‘दायइची सेंक्यो’ (Daiichi Sankyo) मध्यस्थता मामले में मैराथन सुनवाई पूरी होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जापानी दवा निर्माता कंपनी दायइची और भारत की प्रसिद्ध अस्पताल श्रृंखला ‘फोर्टिस हेल्थकेयर’ (FHL) के वकीलों के बीच करीब 50 सत्रों (Sessions) तक चली लंबी बहस के बाद अदालत ने यह कदम उठाया। यह पूरा मामला फोर्टिस के पूर्व प्रमोटरों मलविंदर और शिविंदर मोहन सिंह (सिंह ब्रदर्स) द्वारा किए गए कथित फ्रॉड और भारी-भरकम रकम की वसूली से जुड़ा है।
जानें क्या है पूरा विवाद?
यह कानूनी लड़ाई करीब एक दशक पुरानी है। साल 2008 में सिंह ब्रदर्स ने अपनी तत्कालीन दवा कंपनी ‘रैनबैक्सी लैबोरेटरीज’ (Ranbaxy Laboratories) को जापानी कंपनी दायइची को बेच दिया था। दायइची का आरोप है कि इस सौदे के दौरान सिंह भाइयों ने उनसे धोखाधड़ी की और कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाईं।
इस विवाद पर सिंगापुर के एक ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) ने दायइची के पक्ष में फैसला सुनाया था। एक दशक पहले तय की गई हर्जाने की यह राशि ब्याज जुड़ते-जुड़ते अब बढ़कर करीब ₹5,200 करोड़ हो चुकी है। दायइची इसी रकम को वसूलने के लिए भारत में कानूनी लड़ाई लड़ रही है।
मामला त्रिकोणीय मुकाबले में बदला
दायइची अपनी रकम सुरक्षित करने के लिए सिंह भाइयों को फोर्टिस हेल्थकेयर में अपनी हिस्सेदारी बेचने (कम करने) से रोकना चाहती थी लेकिन इसी बीच बैंकों और वित्तीय संस्थानों (लेंडर्स) ने कर्ज की वसूली के लिए सिंह भाइयों के पास गिरवी रखे फोर्टिस के शेयरों को बाजार में बेच दिया। अब यह पूरा मामला तीन पक्षों सिंह ब्रदर्स, कर्ज देने वाले बैंक और फोर्टिस मैनेजमेंट के बीच एक त्रिकोणीय मुकाबला बन चुका है कि सिंह भाइयों की डूबती संपत्तियों की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा।
दायइची के वकीलों की दलील
अदालत में दायइची का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील अरविंद निगम और वकील गिरिराज सुब्रमण्यम ने फोर्टिस के शेयरों के लेन-देन पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कोर्ट के सामने मुख्य रूप से दो बातें रखीं। जब सिंह ब्रदर्स का फोर्टिस पर नियंत्रण था तब जानबूझकर कंपनी की संपत्तियों को खुर्द-बुर्द (Dissipation) किया गया। दायइची ने दलील दी कि सेबी (SEBI) के नियमों के अनुसार प्रमोटर के शेयर कंपनी के ‘कॉम्प्लायंस ऑफिसर’ (अनुपालन अधिकारी) की मंजूरी के बिना बाहर नहीं जा सकते थे। वकील अरविंद निगम ने जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ के सामने कहा कि वित्तीय संस्थानों ने गिरवी रखे 18.6 करोड़ शेयर बेचे लेकिन इसके बाद बचे हुए 13.99 करोड़ बिना गिरवी वाले शेयर भी उस वक्त बेच दिए गए जब फोर्टिस पर कर्जदारों (सिंह ब्रदर्स) का नियंत्रण था।
फोर्टिस का पलटवार: हमने नहीं दी कोई मंजूरी
दूसरी तरफ फोर्टिस हेल्थकेयर ने दायइची के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया कि प्रमोटरों के शेयर बेचने में कंपनी की कोई भूमिका थी। फोर्टिस के वकील ने कोर्ट में साफ कहा, मुझे यह पुष्टि करने के निर्देश मिले हैं कि फोर्टिस मैनेजमेंट या हमारे कॉम्प्लायंस ऑफिसर ने इन शेयरों के ट्रांसफर के लिए कभी कोई मंजूरी नहीं दी थी।
फोर्टिस ने दायइची पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि जापानी कंपनी के पास पिछले एक दशक से अपने हितों की रक्षा करने के लिए हर कानूनी रास्ता और उपकरण उपलब्ध था लेकिन उन्होंने समय रहते उनका इस्तेमाल नहीं किया। अब वे अपनी लापरवाही का ठीकरा फोर्टिस पर नहीं फोड़ सकते। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अब गेंद दिल्ली हाई कोर्ट के पाले में है जिसका फैसला देश के कॉरपोरेट जगत के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है।



















