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PM मोदी की नई मिडिल ईस्ट रणनीति: भारत-UAE-इजरायल गठजोड़ से बदल रहा पश्चिम एशिया का शक्ति संतुलन

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International Desk: पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, गाजा संकट, ईरान तनाव और ऊर्जा सुरक्षा के बीच भारत तेजी से अपनी नई रणनीतिक भूमिका तैयार कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की यूएई यात्रा को इसी बदलती रणनीति का बड़ा संकेत माना जा रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक अब भारत सिर्फ तेल खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि वह पश्चिम एशिया की राजनीतिक और आर्थिक संरचना को प्रभावित करने वाली ताकत बनना चाहता है।

 

UAE बना भारत का सबसे अहम साझेदार
विशेषज्ञों का मानना है कि UAE भारत के लिए सिर्फ ऊर्जा सप्लायर नहीं बल्कि निवेश, लॉजिस्टिक्स, रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और समुद्री व्यापार का रणनीतिक केंद्र बन चुका है। भारत की सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा है। यहां किसी भी टकराव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, तेल कीमतों और महंगाई पर पड़ता है। इसी वजह से भारत और यूएई के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारण और ऊर्जा सहयोग को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।

इजरायल के साथ बढ़ती साझेदारी
Israel के साथ भारत के रिश्ते रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लगातार मजबूत हुए हैं। विश्लेषकों का कहना है कि यूएई और इजरायल के बीच बने अब्राहम समझौतों ने भारत के लिए नई संभावनाएं खोल दी हैं। इसी के तहत भारत, यूएई, इजरायल और अमेरिका का I2U2 समूह उभरा, जो खाद्य सुरक्षा, ग्रीन एनर्जी और व्यापार गलियारों पर काम कर रहा है। भारत की कोशिश है कि वह पश्चिम एशिया में ऐसा संतुलन बनाए रखे जिसमें अरब देशों के साथ भी संबंध मजबूत रहें और इजरायल के साथ भी रणनीतिक सहयोग जारी रहे।

 

ईरान से दूरी नहीं, लेकिन सीमित भरोसा
भारत की रणनीति पूरी तरह किसी एक धुरी पर आधारित नहीं है। ईरान भारत के लिए अब भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चाबहार पोर्ट और मध्य एशिया तक पहुंच में उसकी बड़ी भूमिका है। हाल ही में ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची की नई दिल्ली यात्रा को इसी संतुलन की कोशिश माना गया। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनावों के कारण भारत-ईरान संबंधों की सीमाएं भी स्पष्ट हैं। विश्लेषकों का मानना है कि भारत यूएई और इजरायल के साथ भविष्य की साझेदारी देख रहा है, जबकि ईरान के साथ संबंध मुख्यतः रणनीतिक आवश्यकता तक सीमित हैं।

 

बहावलपुर में फिर खड़ा हो रहा जैश का अड्डा
दूसरी ओर पाकिस्तान को लेकर भी नई चिंताएं सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक Jaish-e-Mohammed का बहावलपुर स्थित मुख्यालय फिर से बनाया जा रहा है। बताया गया है कि भारत के “ऑपरेशन सिंदूर” में इस परिसर को भारी नुकसान पहुंचा था। लेकिन अब सैटेलाइट तस्वीरों में मरम्मत और निर्माण गतिविधियां दिखाई देने का दावा किया गया है। विश्लेषकों का कहना है कि यह पाकिस्तान की आतंकवाद के खिलाफ प्रतिबद्धता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। रिपोर्टों के अनुसार जैश सरगना Masood Azhar ने खुद स्वीकार किया था कि भारतीय हमले में उसके परिवार के कई सदस्य मारे गए। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर परिवार और करीबी सहयोगी उसी परिसर में मौजूद थे तो यह दावा कमजोर पड़ जाता है कि वह केवल धार्मिक संस्थान था। इसके बाद पाकिस्तान सेना प्रमुख Asim Munir पर भी अप्रत्यक्ष रूप से जैश से निकटता के आरोप लगे।

 

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती
विश्लेषकों के अनुसार भारत अब पश्चिम एशिया में तीन स्तरों यूएई के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी, इजरायल के साथ रक्षा और टेक्नोलॉजी सहयोग और ईरान के साथ सीमित लेकिन जरूरी संपर्क पर काम कर रहा है। साथ ही पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी नेटवर्क पर नजर रखना भी भारत की प्राथमिकता बनी हुई है।भारत की नई पश्चिम एशिया नीति अब सिर्फ “तेल और प्रवासी भारतीयों” तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह रक्षा, व्यापार गलियारों, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ चुकी है।