इंटरनेशनल डेस्क: वाशिंगटन के गलियारों से एक ऐसी खबर आई है जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। मिडिल ईस्ट के तनाव के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब अपनी नजरें पड़ोसी देश क्यूबा पर टिका दी हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि ईरान के बाद उनकी प्राथमिकता सूची में अब क्यूबा सबसे ऊपर है। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने बड़े ही बेबाक अंदाज में कहा कि क्यूबा को ‘आजाद’ करना या उसे अमेरिका के प्रभाव में लेना उनके लिए एक बड़ा सम्मान होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस द्वीप देश के भविष्य को लेकर वे कोई भी बड़ा फैसला ले सकते हैं।
बदहाली की कगार पर क्यूबा और ट्रंप की ‘फ्रेंडली टेकओवर’ डील
क्यूबा इन दिनों अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। वहां की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, बिजली का भारी संकट है और लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ट्रंप का मानना है कि क्यूबा पूरी तरह ढहने वाला है, और यही सही समय है वहां हस्तक्षेप करने का। राष्ट्रपति के बयानों से ऐसा लगता है कि वे लैटिन अमेरिका में अमेरिका का दबदबा फिर से कायम करना चाहते हैं। उनकी योजना क्यूबा के साथ एक ऐसी डील करने की है जिसे वे ‘फ्रेंडली टेकओवर’ कह रहे हैं। यानी बिना युद्ध के, कूटनीति और समझौते के जरिए क्यूबा की सत्ता और व्यवस्था में बदलाव लाना।
क्या बातचीत से सुलझेगा दशकों पुराना विवाद?
फिलहाल खबर यह है कि पर्दे के पीछे बातचीत का दौर शुरू हो चुका है। क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कानेल भी समझौते की राह तलाश रहे हैं क्योंकि उनके पास देश को चलाने के लिए न तो संसाधन बचे हैं और न ही ईंधन। क्यूबा इतना बेबस है कि वह कच्चे तेल का आयात तक नहीं कर पा रहा, जिससे वहां की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था और पावर प्लांट ठप हो गए हैं।
हालांकि, यह राह इतनी आसान भी नहीं है। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि पाबंदियों में ढील तभी मिलेगी जब क्यूबा अपनी राजनीतिक और आर्थिक नीतियों में बड़े सुधार करेगा। दूसरी ओर, क्यूबा अपनी ‘संप्रभुता और आजादी’ के मुद्दे पर अड़ा हुआ है। अगर दोनों पक्ष अपनी शर्तों पर पीछे नहीं हटे, तो इस बातचीत के बीच एक नया कूटनीतिक विवाद खड़ा होने की भी पूरी आशंका है। अब देखना यह होगा कि आने वाले कुछ महीनों में क्यूबा में ‘लोकतंत्र’ की वापसी होती है या यह इलाका एक नए संघर्ष का केंद्र बनता है।









