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लाहौर में बड़ा फैसला: इस्लामपुरा फिर बना कृष्णा नगर, इन 9 जगहों को मिली पुरानी पहचान

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इंटरनेशनल डेस्क: भारत के पड़ोसी देश Pakistan से एक अहम खबर सामने आई है। यहां के Lahore शहर में ऐतिहासिक फैसला लेते हुए 9 प्रमुख स्थानों के इस्लामिक नाम बदलकर उनके पुराने नाम बहाल कर दिए गए हैं। लाहौर जिला प्रशासन ने इन नामों को बदलने की औपचारिक मंजूरी दे दी है।

-इस बदलाव के तहत लाहौर के मशहूर इलाके ‘इस्लामपुरा’ का नाम बदलकर फिर से ‘कृष्णा नगर’ कर दिया गया है।
-वर्ष 1992 में Babri Masjid demolition विवाद के बाद जिस ‘जैन मंदिर चौक’ का नाम बदलकर ‘बाबरी चौक’ रखा गया था, उसका नाम भी अब दोबारा ‘जैन मंदिर चौक’ कर दिया गया है।
-इसी तरह सांदड़ा के ‘मौलाना अहमद अली लाहौरी फ्लाईओवर’ का नाम बदलकर ‘सांदड़ा फ्लाईओवर’ कर दिया गया है।
-वहीं ‘लक्ष्मण सिंह रेलवे स्टेशन’ के आसपास के क्षेत्रों के नाम भी स्थानीय इतिहास के अनुसार बदले गए हैं।
-इतना ही नहीं, शहर के मशहूर लक्ष्मी चौक और डेविस रोड जैसे नाम भी दोबारा चर्चा में हैं। कई जगहों पर ब्रिटिश दौर के नामों को भी वापस अपनाया जा रहा है।

नाम बदलने का यह कदम पाकिस्तान की पंजाब सरकार की उस कोशिश का हिस्सा है, जिसके तहत लाहौर की बँटवारे से पहले की उस विरासत को वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसके बारे में कई लोगों का मानना ​​है कि दशकों के दौरान वह धीरे-धीरे मिट गई थी। पंजाब सरकार के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी PTI को बताया, “कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री मरियम नवाज़ की अध्यक्षता में हुई पंजाब कैबिनेट की बैठक में, लाहौर और उसके आस-पास की विभिन्न सड़कों और गलियों के मूल और ऐतिहासिक नामों को बहाल करने की एक योजना को मंज़ूरी दी गई थी।”

9 जगहों को वापस मिल गई आधिकारिक तौर पर उनकी पुरानी पहचान
पिछले दो महीनों में, लाहौर के कई हिस्सों में पुराने नामों वाले नए साइनबोर्ड दिखाई देने लगे हैं। 9 जगहों को आधिकारिक तौर पर उनकी पुरानी पहचान वापस मिल गई है। इनमें लक्ष्मी चौक शामिल है, जिसका नाम कभी बदलकर मौलाना ज़फ़र अली खान चौक कर दिया गया था; डेविस रोड, जो सर आगा खान रोड बन गया था; और क्वींस रोड, जिसे फ़ातिमा जिन्ना रोड के नाम से जाना जाता था। ‘द प्रिंट’ के अनुसार, लाहौर का मशहूर लॉरेंस गार्डन भी, बाग-ए-जिन्ना के रूप में कई साल बिताने के बाद, अपनी पुरानी औपनिवेशिक पहचान को फिर से अपना रहा है।

लाहौर में 9 प्रमुख स्थानों के नाम पुराने ऐतिहासिक नामों पर बहाल किए गए।
इस्लामपुरा → कृष्णा नगर
बाबरी मस्जिद चौक → जैन मंदिर चौक
सुन्नतनगर → संत नगर
मौलाना जफर अली खान चौक → लक्ष्मी चौक
मुस्तफाबाद → धरमपुरा
सर आगा खान चौक → डेविस रोड
अल्लामा इकबाल रोड → जेल रोड
फातिमा जिन्ना रोड → क्वींस रोड
बाग-ए-जिन्ना → लॉरेंस गार्डन
लोग आज भी इन इलाकों को पुराने नामों से ही बुलाते हैं
लेकिन लाहौरियों के लिए, ये नाम कभी मिटे नहीं। लाहौर के ‘वॉल्ड सिटी’ के पूर्व डायरेक्टर-जनरल और LAHR के सेक्रेटरी कामरान लशारी ने बताया, “लोग आज भी उन्हें पुराने नामों से ही बुलाते हैं।” उन्होंने कहा कि इस बहाली की कोशिश में जान-बूझकर लाहौर की मिली-जुली पहचान को अपनाया गया है — जिसमें मुस्लिम, सिख, हिंदू, ईसाई और औपनिवेशिक, सभी पहचानें एक साथ मौजूद हैं।

उन्होंने कहा, “चाहे वह ईसाई हो, सिख हो, हिंदू हो या पारसी, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।” लाहौर ने बंटवारे से पहले के पंजाब की यादों को फिर से ज़िंदा किया है। लाहौर लंबे समय से इस उपमहाद्वीप की यादों में इस तरह बसा हुआ है, जैसा शायद ही कोई दूसरा शहर बसा हो। अमृतसर से महज़ 50 किलोमीटर दूर, यह कभी अलग-अलग धर्मों और समुदायों के पंजाबियों के लिए एक साझा सांस्कृतिक घर हुआ करता था। इसके भीड़भाड़ वाले बाज़ार, पुराने कॉलेज, बाग़-बगीचे, अखाड़े, मंदिर, गुरुद्वारे और दरगाहें उस पंजाब का हिस्सा थीं, जो 1947 में बंटवारे के बाद इस इलाके के दो देशों में बंटने से पहले मौजूद था।

बंटवारे ने लाहौर को हमेशा के लिए बदल दिया। 1947 की हिंसा के दौरान ज़्यादातर हिंदू और सिख परिवार या तो वहां से भाग गए, या उन्हें ज़बरदस्ती वहां से निकाल दिया गया। उसके बाद के दशकों में, कई सड़कों, मोहल्लों और मशहूर जगहों के नाम, जो कभी हिंदू, सिख या ब्रिटिश इतिहास से जुड़े थे, धीरे-धीरे बदलकर इस्लामी या राष्ट्रवादी पहचान वाले नाम रख दिए गए।

कृष्ण नगर, इस्लामपुरा बन गया। धरमपुरा, मुस्तफ़ाबाद बन गया। जैन मंदिर रोड, बाबरी मस्जिद चौक बन गया। फिर भी, पुराने लाहौर ने अपनी पहचान को पूरी तरह मिटने नहीं दिया। लेकिन लाहौर की सड़कों पर, पुराने नाम कभी पूरी तरह से मिटे नहीं। चाय बेचने वाले, दुकानदार, रिक्शा चलाने वाले और वहां के रहने वाले लोग अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में आज भी उन्हीं नामों का इस्तेमाल करते हैं। कई लाहौरियों के लिए, लक्ष्मी चौक हमेशा लक्ष्मी चौक ही रहा, चाहे साइनबोर्ड पर या सरकारी फ़ाइलों में कुछ भी लिखा हो।