International Desk: पाकिस्तान में एक 14 वर्षीय ईसाई लड़की के कथित अपहरण, जबरन धर्मांतरण और शादी के मामले ने एक बार फिर अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर बहस छेड़ दी है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और चर्च संगठनों का कहना है कि यह मामला उन कई घटनाओं जैसा है, जिनमें नाबालिग अल्पसंख्यक लड़कियों के धर्मांतरण और विवाह को लेकर विवाद सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 14 वर्षीय निशा बीबी घरेलू सहायक के रूप में काम करती थी। आरोप है कि एक विवाहित मुस्लिम व्यक्ति उसे अपने साथ ले गया, जिसके बाद उसके धर्मांतरण और विवाह से जुड़े दस्तावेज सामने आए।
लड़की के पिता अब्बास मसीह ने दावा किया कि परिवार को इन दस्तावेजों की कोई जानकारी नहीं थी। उनका आरोप है कि उनकी बेटी नाबालिग थी और प्रस्तुत किए गए कागजात वास्तविक परिस्थितियों को नहीं दर्शाते। परिजनों का कहना है कि पुलिस ने उन्हें ऐसे दस्तावेज दिखाए जिनमें लड़की को बालिग बताया गया था और यह दावा किया गया था कि उसने अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन कर विवाह किया है। परिवार ने इन दावों को खारिज करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसे मामलों में उम्र, सहमति और दस्तावेजों की वैधता को लेकर अक्सर विवाद पैदा होते हैं।
रिपोर्ट में एक अन्य घटना का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें 16 वर्षीय ईसाई लड़की जिया लियाकत के अपहरण का आरोप लगाया गया था। परिवार का दावा है कि मामले की जांच में पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई और बाद में लड़की के विवाह को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया। मानवाधिकार समूहों का कहना है कि इन मामलों में पुलिस कार्रवाई, कानूनी प्रक्रियाओं और पीड़ित परिवारों की शिकायतों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।










